अगले सेमेस्टर देखना…

“उठो बे! और कितना सोना है? खाने का टाईम हो गया!” राव साहब अंगड़ाई लेते उठे और फ़र्श पर टटोल के देखा, हाथ में एक टीशर्ट आयी।सूँघने पर लगा कि अभी एक दिन और काम चलाया जा सकता है।

“चल भाई, साथ चलते हैं।”

“नहीं। तुम जाओ, मेरा एग्ज़ाम है कल। आज नहीं खाना।”

”अबे चलो यार। पंद़्रह मिनट पढ कर क्या उखाड़ लोगे? मैं भी तो जा रहा हूँ ना!”

तभी राव साहब के पेट से ज़ोर की आवाज़ आयी और ज्यादा बहस करना सही नही लगा उन्हें।”मराओ साले। तुम नंबर के पीछे ही भागते रहो। 3 इडियट्स याद नहीं?  कूल बनो, ‘कूल’।”

राव साहब ने पूरे ‘कन्टेम्प्ट’ के साथ आशीष को एक ‘लुक’ दिया और कान में हेडफ़ोन डाल के मेस की ओर चल पड़े।

ये होता है एग्ज़ाम के वक्त हॉस्टल का  नज़ारा। कुछ लोग पढते हैं, कुछ लोग जी जान से पढते हैं, और कुछ… कुछ लोग ‘कूल’ होते हैं।

आशीष ने सर हिलाया, राव साहब की बातों को ऐज़ यूज़ुअल ‘डिस्कार्ड’ किया, और वापस पढाई शुरू कर दी। इस बीच राव साहब का खाना हो गया और मेस वालों को गाली देते उन्होंने बगल वाले रेस्तराँ का रास्ता पकड़ा।

“ऐसा खाना तो मज़दूर भी नहीं खाते। लूट मचा रखी है इन्होंने।”

“अरे राव साहब! किधर चले? एग्ज़ाम नहीं है कल?”

राव साहब के कुछ दोस्त भी उनके पीछे ही थे। उन्होनें बड़ी गर्मजोशी के साथ कई तरह की गालियों से एक दूसरे का स्वागत किया, फिर सारे एक साथ चल दिये।

“अरे एग्ज़ाम्स तो आते जाते रहेंगे, लेकिन अभी का समय वापिस नहीं मिलने वाला।”

राव साहब सीरियस मूड में आ गये थे। फिलोसोफिकल ज्ञान की नदी बह चली थी।
“होते हैं कुछ लोग, साले दिन भर घुसे रहते हैं किताबों में। अब भाई ज़िंदगी किताबों में बरबाद करने को थोड़े ही मिली है। लाइफ़ शुड बी इन्जॉय्ड, यू नो?”
सारे दोस्तों ने हामी भरी।

”चल यार, खाना वाना छोड़, सुट्टा मार के आते हैं। एग्ज़ाम के पहले मूड फ़्रेश करना ज़रूरी है।”
राव साहब के मूड ने पलटी मारी, और चल दिये सभी एक साथ।

6 घंटों बाद आशीष कुरसी पर से उठा और जोर की जम्हाई ली। सिलेबस खत्म होने के बाद की फ़ीलिंग ही कुछ और होती है। तभी जोरों से दरवाज़ा खुला और राव साहब लड़खड़ाते हुए अंदर आये।

“कल का एग्ज़ाम तो अपना है भाई, कल टॉप मार रहा हूँ…”

कहते कहते राव साहब बिस्तर पर धराशाई हो गये। आशीष ने राव साहब को दो सेकेण्ड देखा, सर झुकाया, और लाइब्रेरी की ओर चल पड़ा।

एक महीने के अंदर रिज़ल्ट आ गया। आशीष फिर से नाइन प्वाइंटर था, पर राव साहब कहीं दिख नही रहे थे। वे इन सब चीज़ों से अलग, सुट्टा लगाने में बिज़ी थे।

“इन छोटे से एग्ज़ाम्स से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अगले सेमेस्टर देखना मेरी रैंक।”

अब राव साहब को याद कौन दिलाता कि पिछले 7 सेमेस्टर से वह यही बात दोहरा रहे हैं, और गाड़ी कब की निकल चुकी है।

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